बीते दिनों, देश के विभिन्न विद्यालयो में बढ़ायी गयी शुल्क ने एक व्यापक मुद्दे का रूप ले लिया है। संभवता आप सभी लोग ज्ञात होगे।
निसंदेह, शिक्षा समाज की एक आवश्यकता है जो इसको बनाने में, संवारने के लिए जरूरी ही नही अपितु अनिवार्य भी है। शिक्षा हमे एक ऐसी शक्ति प्रदान करता है जिससे हम अपने आसपास घटित होने वाली घटनाओ की विवेचना करते है, तर्क करते है और साथ ही उस सर्वांगीण समाधान की तरफ बढ़ते है जिसमे सबका विकास और हित निहित होता है। इस प्रकार शिक्षा एक ऐसा अनिवार्य विषय बन जाता है जिसको धर्म, जाति, वर्ण, पंथ, रंग, लिंग, स्थान, पहुँच, आवश्यकता, और धन की उपलब्धता के आधार पर विभाजन न किया जाये। हमारी वर्षो की समझ और परिणाम बताते हैं की किस प्रकार से शिक्षा को केवल उच्च और उसके तटष्ठ वर्णों तक ही सीमित रखा गया जिसकी वजह से सैकड़ों शताब्दियों तक निम्न वर्गो का शोषण होता रहा, जो की बहुसंख्यक भी था। इतिहास में कुछेक उदहारण है जब निम्न वर्ग के लोगो ने उच्च शिक्षा ग्रहण की, किन्तु इसको निम्न वर्ग की उच्च शिक्षा तक व्यापक पहुँच और इसको ग्रहण करने की क्षमता में व्यापक कमी की तरह नही आँका जा सकता है। पुराने भारत वर्ष में व्याप्त ऐसी समाजिक शिक्षा प्रणाली ने तब के वर्गो में विक्षोभ की भावना को जन्म दिया, इन विक्षोभों को दबाने के लिए तरह तरह के ग्रंथो की रचना की गयी, जिनको व्यवस्थागत तरिके से समाज के हर वर्ग के अंदर प्रवेश किया गया। अंत में आकर इन ग्रंथो की अवहेलना को ईश्वर, ब्राम्हण और राजा का तिरस्कार बताया गया। इस प्रकार एक ऐसे जटिल समाज का गठन किया गया जिसमे रीति-रिवाज, ढोंग, कर्म-कांड, और कुरीतयो का बोल-बाला हो गया। मतलब, एक स्वस्थ समाज की परिकल्पना की जिम्मेदारी केवल एक वर्ग को देने के कारण परिपूर्ण नही हो पायी। इस प्रकार, हमने जो एक नया समाज बनाया उसमे सबकी भावनात्मक और व्यापक भागीदारी को स्थान ही नही दिया जो अंत में जाकर यही हमारे समाजिक विघटन का कारण बने और हमारी 800-900 वर्षो की गुलामी इसका अमिट प्रतीक है।
इसके बाद शुरू हुआ वो सिलसिला जो आज तक जारी है, जिस-जिस को जब-जब सम्भव लगा उसने तब तब इस व्यवस्था को त्यागना शुरू कर दिया क्योंकि गुलाम- काल में उन दबे कुचे और अवांछित लोगो को एक दूसरा विकल्प दिया जिसमे उनके आत्म सम्मान की रक्षा दिखाई दी।
अंततः इस शिक्षा प्रणाली का हमने परित्याग किया सन् 1947 में, जब विदेशी ताकतों से जकड़े भारत ने नई करवट ली और खुद को इससे मुक्त किया। बीतें, 70 सालो में हमनें एक ऐसा समाज देखा जिसमे समानता के लिए संघर्ष चला, नए नए सुधार सम्भव हो सके क्योंकि हमने लोकतांत्रिक व्यवस्था को स्वीकार किया। समांतर रूप से चले शिक्षा और अधिकारो के संघर्षो के कारण एक ऐसे समाज का घठन प्रारंभ हुआ जिसमे नीचले तबके के लोग कुलीन वर्गो के समांतर खड़े होने लगे। जंहा, पहले ऊँचे तबके के लोगो के लिए खड़े होने को मान-सम्मान की नजर से देखा जाता था और इसको महिमा-मण्डित भी किया जाता था उनकी जगह अब संघर्षो ने ले ली। निचले वर्गो ने ऐसे कृत्यों को अस्वीकार करना प्रारंभ कर दिया। बीते 70 वर्षो से ये संघर्ष चलता जा रहा है और कब तक चलेगा ये कहना मुश्किल है।
अब प्रश्न आता है की जिस वर्तमान शिक्षा प्रणाली को हमने स्वीकार किया है उसमे वो कौन से सुधार की जरूरत है जो हमारे सामाजिक ढांचे को और मजबूत करे साथ ही साथ ये समाजिक न्याय, समता, और समानता के आधार को भी मजबूती प्रदान करती हो।
प्रथम, प्रश्न तो यही है की हम जिस शिक्षा प्रणाली से समानता और समता की उम्मीद कर रहे है वही आर्थिक असमानता का शिकार बनी हुई है। पहले से ही पंगु शिक्षा व्यवस्था में इसका निजीकरण होना किसी आघात से कम नही है। यही निजीकरण आगे चलकर आर्थिक, समाजिक और राजनैतिक असमानता की खाई को और बढ़ाएगा। तो प्रश्न है की जब लौट कर बुद्धू को घर ही आना था तो इतने वर्षो के संघर्षों का क्या अर्थ था?
देश में स्थापित विश्वविद्यालयों में अतरिक्त शुल्क का बढ़ाना पहले से ही उपेछित वर्गों को शिक्षा का अधिकार तो दूर उनसे उनके सपने छीनने जैसा ही है।
किसी भी परिस्थितियों में ऐसे किसी भी विचार का समर्थन करना कदाचित उचित नही होगा। जब सरकार उच्च शिक्षा के नाम पर अतरिक्त कर लगाती है तो सरकार को ये अधिकार कैसे है की वो कुछ नई नीतियों को लाकर पहले से ही धनी लोगो को शिक्षा के लिए संचलित उपलब्ध कर का लाभ प्रदान करे? यह अतार्कित ही नही अनुचित भी है। ऐसी किसी भी नीति का हमे विरोध अत्यंत जरूरी है जो स्वयम् शिक्षा व्यवस्था में असमानता को जन्म देती हो। देश के दूरस्थ स्थित प्रान्तों में रहने वाले लोगो का भी शिक्षा ग्रहण करने का भी उतना ही अधिकार है जितना की दिल्ली, मुम्बई, और धन से परिप्पूर्ण शहरो में रहने वालो का है।
अगर उच्च शिक्षा गुणवत्ता, सांस्कृतिक सद्भाव, प्रोद्योदकी समावेश, और स्थिरता को बढ़ाना शिक्षा व्यवस्था में निजीकरण की मांग को परिपूर्ण करते ही है तो हमारे सविंधान में इस बात की पूर्ण व्यवस्था होनी चाहिए की सार्वजानिक शैक्षणिक संस्थान सभी वर्गो की पहुँच में होंगे और गुणवत्ता के आधार पर निजी शैक्षणिक संस्थानों की बराबरी भी करेगे।
हमारे समाज में अर्जित अनुभव और शिक्षा ही व्यक्ति को इतना काबिल बनाती है जिसमें वो अपनी बात को रख पाये और समाजिक समीकरण को बनाने में अपना योगदान दे पाये, इसके लिए हमे जरुरी है की हम आगे आये और उन सभी नीतियों पर विरोध दर्ज करवाएं जो शिक्षा में समावेश की अवधारणा को आघात पहुचाते हो।