"उज्जवल कामना "

प्राज्ञ शुभारंग शुरू हुआ,
हिन्द पताका फहराएगी |
हर व्यक्ति होगा अखिल दक्ष ,
अब पुष्पित शुबह हो जाएगी |

अबकी इस होली में
तरणि-तनुजा जल लाएगी |
रंग भरा हुआ होगा जो ,
पिचकारी वो फैलाएगी |

अबकी ज्वार तेज होगा ,
कपट पताका  हिल जाएगी |
देख कपटी भी विचलित होगा ,
जब नौका हिचकोले खायेगी |

अबकी बार जब सूरज होगा
शिथल धुप ढल जाएगी |
उस नई सवेरी किरण में ,
अब भारती खिलखिलाएगी |

कंठित होगा नया राग ,
हर खग नित संगीत बनाएगी |
विपुलव हुआ मैदानों में,
खुशियाँ हिमालय जाएंगी |

रमणी होगी हर स्त्री,
पौरुष रूप दिखाएगी |
विदुषी होगी जेहन से,
अम्बर पर छा जाएँगी |

नही सोयेगा जब भूखा कोई
प्रकृति भी मुस्कायेगी |
उम्मीदों की मीनारें होंगी,
सफलता चोटियां बनाएगी |

छद्म,पाखण्डो और हथकंडो से,
ये वसुंधरा मुक्त हो जाएगी |
जब हुई है लड़ाई दनुज से,
तो निश्चय ही विजय आएगी |
           ———- रावेन्द्र कुमार

था किसको पता !!

मदहोश था जमाना हमारी नाकामियां देखकर ,
गए थे हम कैसे मंजिलो के पास, था किसको पता!

ताबीर थे सपने मेरे, क्यू बेबस हुआ जमाना देखकर
नवाज़िश होती है असफलता भी, था किसको पता!

कल तक जो हटा लेते थे नज़र. हमारे घर देख कर
वो होंगे पासवान हमारी महफ़िलो में, था किसको पता!

ताना देता था खुद हमारा हमराही, हमारी वस्ल देखकर
होगी सहर मेरी गुमनाम राहों में, था किसको पता!

रुपहले परदे पर छद्म गढ़ते थे जो, हमारी शक्ल देखकर
जल उठेगा आफताब भी हमारा, था किसको पता!

बिछाए थी जिन्होंने बाधाए, हमारी उल्फत को देखकर
आज उल्फ़ते-ऐ-सागर में ठहरेंगे हम, था किसको  पता!

                                        —– रावेन्द्र कुमार

"छाया तेरी यादों की "

चन्द लम्हे है तुम्हारे पास मेरे,
सहेजकर रखूंगा उनको |
नाकाफी है वो घड़ियां सवरने को मेरे,
अब न लौटऊगा तुझको ||

अंकित है वो झनकारे मन में मेरे,
बैठ गुनगुनाता हूँ उनको |
सजे थे सपने जो यादो में तेरे,
अब न बताऊँगा तुझको ||

है तेरी जो लकीरे किस्मत में मेरे,
ले प्रस्तर मिटाऊँगा उनको |
रुका प्रवाह है जो तन में मेरे,
अब न बहाऊंगा उसको ||

जो आकांक्षाये है थी दिल में मेरे,
भूल जाऊंगा उनको |
हुए थे जो सपने पूरे मेरे,
अब न भुलाऊँगा उनको ||
  
                                              ——  रावेन्द्र कुमार

" एक शाम सुहानी सी "

देख पायल तेरे पैरो की
राग बजने लगे ……
चार बुँदे क्या गिरी
सब वापस लौटने लगे…
संध्या भी न हो पायी
बयार चलने लगे …
चिपचिपाते पैर भी अब
तेज चलने लगे ..
खेतो की रौनके अब
ग्राम को बढ़ने लगे …
बैठे बगुले मेड पर
सहसा ही उड़ने लगे…
पेड़ो की चहचाहट बढ़ती पर
अब सन्नाटे परसने लगे …
सूरज जा छुपा मेघो पर
हम निशा को बढ़ने लगे…
रंग उड़ाती तितलियो के
पंख जोर भरने लगे ..
देश भ्रमण पर निकले खग
घोषलों पर लौटने लगे ..
मनोरम हुआ ग्राम जीवन
मृदंग बजने लगे….
नन्हे-नन्हे, बौछारो पर 
खिलखिलाने  लगे…
दुपकी जिंदगिया जलाशयो पर
अब बुदबुदाने लगे …
खड़े थे जो घर अब तक
टप-टपाने लगे..
मोर बैठे जो खपरैलों पर
अब बोलने लगे ..
चार बुँदे क्या गिरी
सब वापस लौटने लगे..
            
                —– रावेन्द्र कुमार

" **** कर गया है मुझको"

यह अहसास है तेरे चुम्बन का
घुघरालें बालो का,
काली आँखों का,
कोमल काया का,
जो मदहोश कर गया है मुझको |

यह आवाज है तेरे अधरों की,
मर्म सासों की,
धड़कती धड़कनो की,
झपकती पलकों की,
जो ध्वनिक कर गयी है मुझको |

यह नशा है उस अतरंग पल का,
दूधिया बांहो का,
कामुक बदन का,
सर्पित कमर का,
जो मुश्कित कर गया है मुझको |

यह दृश्य है उस मनोरम क्षण का,
जूही-तन का,
समर्पित मन का,
भाव निश्छल का,
जो अपना कर गया है मुझको |
          
                   — रावेन्द्र कुमार 

" प्रीत लगा ली नैनों ने "

प्रीत लगा ली नैनों ने,
दिल दिलदारियां भर आया।
भुजा फिरंगी हुई है आज ,
मन मन-गलियां घूम आया ।
नैनों की बस्ती रंग भरी थी,
कदम कदम पर बसंत खिली थी ।
उस पगली हसती लड़की के मुख पर ,
मुझे सूरज की पहली किरण मिली थी ।
लचक थी ऐसी उसकी नज़रो  पर,
जैसे जब कदम्ब की डाल हिली थी ।
नयन नखरे नाज़ उस पर ,
नयन नगरी पवित्र खड़ी थी ।
    प्रीत लगा ली नैनों ने…
दिल दबंग हुआ था मतवाला,
तो नशा हुआ था मधुसालय ।
जब दिल दीदारे किया था उसको,
तब रूप हुआ था कवितालय |
तरंगित हृदय हुआ था उसका,
तब हृदय हुआ था हर्षालाय।
द्रवित दिल अब नही था उसका ,
पुलकित हृदय हुआ अब पुष्पालय।
            प्रीत लगा ली नैनों ने …
मन मन्द-मन्द मुखित हुआ,
मानो वो मुस्कान भरे।
जो अपनों से था व्यथित हुआ,
अब दूर गगन जा उड़ान भरे।
लय, ताल, राग अब संगीत हुआ ,
बेराग राग भी अब राग बने।
ये मनवा भी अब मधुमित हुआ,
वजह बेवजह अब उड़न भरे ।
           प्रीत लगा ली नैनों ने…
                ———- ” रावेंद्र कुमार “

" ममता की परछाई "

जरा थाम ले मेरा दामन कंही फिसल न जाऊ मैं,
रोक ले मुझको आके तू कंही दूर निकल न जाऊ मैं।
बचपन से तूने बड़ा किया कंही चला न जाऊ मैं,
वो तेरे मेरे सपने थे जो कंही बिखरा न आउ मैं।
चला हूँ जिन राहों पर कंही गुम न हो जाऊ मैं,
भटका हूँ जब राहो पर अब किसको बुलाऊ मैं।
एक आँचल तेरा है नही,अब कैसे आंसू पोछु मैं,
क्या सोचकर बड़ा हुआ कैसे अब बतलाऊ मैं।
धूल भरे पैरों से जब तेरे गोदी सो जाऊ मैं,
बंगलों में भी वो नींद न आती कैसे यह बतलाऊ मैं।
तेरी सूखी रोटी भी कितनी मीठी समझकर खाऊ मैं,
पिज्जे से भी वो भुख न मिटती कैसे अब मिटाऊ मै।
कान नही जब पकड़े कोई तो क्यों अब रोउ मैं,
अश्रु बहने को बैठें है पर अब कैसे उन्हें बहाऊ मैं।
तू खिलखिला कर हस्ती थी जब भी मुस्कराउ मैं,
अब ख़ुश भी नही होता कोई तो क्यों अधर उठाऊ मैं।                  
अब नही रहा जाता दूर तुझसे मुझको,दिल करता है,                  
फिर उसी समुन्दर सरीखी दुनिया में उतर जाऊ मैं।
  
                                           —— रावेंद्र कुमार

" एक्सीडेंट की दिनचर्या "

आज सुबह हाइवे पर सड़क लहूलुहान थी
गाड़ियों की तेज रफ़्तार में
एक हल्की सी चीख थी
सुनना बहुत मुश्किल था
तेज ठण्ड में कोहरा भी बहुत था
ऐसा नही है कोई सुन नही पा रहा था
पर वास्तम में खुदगर्ज जिंदगी से
इंसानियत सर्मसार थी
लोग बढ़ते जा रहे थे
कुछ नज़र भी फेर रहे थे
उनमे एक महासय सायद शेल्फी भी ले रहे थे
कुछ का ह्रदय विशाल निकला
सायद उनकी आत्मा में कुछ
हया थी,
तभी तो भाई साहेब ने 101 पर
कॉल की 
तेज चीख अब हल्की सिसकी बन रही थी
लाश जैसी पड़े थी वो
पर जिंदगी के संघर्ष में हार नही रही थी
ट्रैफिक की पुलिस सो रही थी
घंटी बजी तो उठी,
पहुच गयी घटनास्थल पर
तड़पता शरीर लेकर अपनी गाड़ी पर
और इतनी तेज रफ्तारपुलिस की
की पूछो ही मत!
अब तक हार चुकी वो बेचारी
न चीख थी न पुकार थी
पुलिस ने अब बैठकर केस बनाया
एक्सीडेंट का सीन था
FIR भी कर दी उसने
पर मामला कहा घम्भीर था   
कुछ दिन बीत गए
ये खत्म ही होता
चार दिन बाद फिर उसी सड़क पर
उसी जगह
उसी समय
एक नई चीख थी
हमारे भ्रस्ट सिस्टम की
ये जीती जागती मिशाल थी |

             ——–  रावेन्द्र कुमार

"स्वच्छन्द अहसास "

  तू धड़कन है उन अहसासों की ,
             जो पलक ढले ही गुम हो जाये |
           तू हकीकत है उन लम्हो  की ,
       जो  जाकर वापस न आये||
                   ऐ जिंदगी तू कितनी झूठी है,
                                     क्यू सिखाती है वो ही जो समझ न आये ?
                   मेरे कर्मो-ओ-खुदा जितना भी सीखा है,
        आजमाना चाहा है हरदम |
          गए है जिस भी मंजिल तले,
           टूटा पाया  अपना हर कदम |
                                   ऐ उम्र-ए-तजुर्बे क्यू बताई है वो ही रांहे?
                                         जो ठीक मंजिल के समीप ही ख़त्म हो जाये॥

ह सकते है कुछ लोग,
               कि नही किया होगा प्रयाश मैने | 
              पर नही है सच ये कहना तुम्हारा,
              बचा रखी थी मैने भी कुछ आश 
                                        इसलिए बदली थी मंजिले राहों के साथ 
                                                        कमबख्त गयी और भी वो बढ़ हमारी चालो के साथ ॥

                                                                     ——— रावेन्द्र कुमार

एक तेरे सहारे …

बैठ तक़दीर सहारे आज भी, मैं तेरी राह ताकता हूँ,
तू मिल जाएगी मुझको, ये ख्वाब आंकता हूँ ||

मेरी गुमनामी का मलाल भी नही तुझको,
पर जिस राह तू जाती है, मैं वो हर राह जानता हूँ ||

सुनसान गलियों का राही हो गया हूँ, आजकल
हूँ आवारा, पागल,दीवाना ये रोज सुनता हूँ  ||

बिन तेरे जीने की कोशिश कर रहा हूँ मैं आज भी,
कमबख्त ये आदत बनाने के वास्ते सारी रात जागता हूँ ||

मेरी जिंदगी की राहों में लुटा हुआ समां है,
जो बरसता नहीं बादल, वो आ थमा है ||

तेरी यादों में अब कैद है मेरी जिंदगी,
हो सके तो लौटा दे मेरी धड़कन, जो तेरे पास जमा हैं ||
                                                                                     
                                         —— रावेन्द्र कुमार
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